दीपदान
सूर्यास्त का समय काशी का दशाश्वमेघ घाट जहां प्रथम शंखनाद से देवताओं का आवाहन किया जाता है। फिर शुरू होती है चारों ओर घंटियों, डमरूओ, शंखनादो, मृदंगो, मंत्रोचारणों की गूंज।
सुंदर वेशभूषा में दिखते पुजारी.. एक अनोखी महक के साथ उठती हुई आरती की ज्वाला.. आसमान को आगोश में लपेटता हुआ धुआं.... घाटों की सीढ़ियों पे सजा लाखों दिया.... और नदी में तैरते अनगिनत झिलमिलाते दिए.....हर तरफ जगमग-जगमग दियो की जगमगाहट मानो चांदनी रात में आसमान से धरती पे तारे उतर आए हो और इसके साथ गंगा नदी का मनोरम दृश्य बहुत सुंदर लगता है। काशी के अर्द्ध चंद्राकार घाट जब दीपों का हार पहनकर प्रज्ज्वल होते हैं तो इस स्वर्गिक आभा का दर्शन एक अद्भुत अनुभूति कराता है।
भव्य गंगा आरती का साक्षी बनने हर शाम हजारों लोगों का हुजूम बनारस के घाट पर उमड़ पड़ता है। मंत्रों के उच्चारण, घंटों की आवाज, नगाड़ों की गूंज को सुन कर ऐसा लगता है कि ये हमारे अंतरात्मा को शुद्ध कर रही हो और आप उस दिव्य अनुभूति में ध्यान लगा कर आरती के स्वर में कही खो जाएंगे।
लेकिन कोई था जो उस भीड़ में भी घाट पे बैठ कहीं शून्य में खोया हुआ किसी इंतजार में देख रहा था दूर तक फैले गंगा के पाट को, दूर दूर तक दीपों से सजे घाट को, तेज गति से बहती हुई चंचल गंगा की धार को, और देख रहा था अनेकों नए जोड़ों को करते दीपदान को।
हां दीपदान..!!
यही तो मृगाक्षी की इच्छा थी उस दिन कबीर के साथ गंगा की अविरल धारा में दीपदान करने की। अपने प्रेम को गंगा की लहरों से संघर्ष करते दूर तक जगमगाते दीप के रूप में जाते हुए देखने की। कितना जिद किया था उसने उस शाम काशी के घाट पे देर रात तक बैठने की।
कितनी ही बार मना किया था कबीर ने चलो लौट चले सूर्यास्त होने को है मगर वो नहीं मानी थी और बैठी रही कबीर के कांधे पे अपना सर रख उसके मजबूत हाथों को अपने कोमल हाथों से कस कर पकड़ कर। साथ ही एक जिद मुझे दीपदान करना है तुम्हारे साथ। वो मन ही मन सोचती रही अपने प्रेम के साथ, अपने प्रेम के लिए मगर कबीर से कह न सकी।
उस वक्त तो कबीर को भी लग रहा था बस ये पल यही ठहर जाए और ये उम्र यूं ही गुजर जाए। कैद कर लेना चाहता था वो मृगाक्षी के साथ गुजरा हर पल मगर वक्त कहां कैद हो पाता है किसी की मुट्ठी में। वो तो लगातार फिसलता जाता है रेत की तरह बंद मुट्ठी से।
उस शाम देर रात वो मृगाक्षी को उसके गली के बाहर तक छोड़ कर वह लौट गया उसी घाट से होता हुआ अपने घर को। कहां जानता था वो की आज के बाद वो कभी मृगाक्षि से नहीं मिल पाएगा और साथ ही अधूरी रह जायेगी मृगाक्षी की जिद और उनके इश्क़ की कहानी।
उस दिन जब मृगाक्षी देर रात अपने घर पहुंची थी। घरवालों के सवालिया नजरों से बचने के लिए उसने दोस्त के घर रुक के पढ़ाई करने का बहाना दे दिया था। मगर मौहल्ले की एक आंटी जी ने बात बात में उसके मां के कान आखिर भर ही दिए।
उसके बाद शुरू हुआ जोरशोर से सिलसिला मृगाक्षी के लिए योग्य वर ढूंढने का। कितनी ही बार मृगाक्षी रोई थी गिड़गिड़ाई थी मगर किसी ने उसकी एक न सुनी।
एक चंचल सी लड़की को घर में नजरबंद कर दिया गया और एक ही पल में छीन ली गई उसकी आजादी।
कितनी ही बार वो अपने पिता से कहती रही एक बार उसपे विश्वास कर ले। मगर उनके आंखो पे तो पहले ही पट्टी बांध दी गई थी कहां दिखता उनको बेटी के आंसू, कहां बांट पाते वो उसका दर्द, उसका दुख।
जितना तो उन्हे समाज की फिक्र नहीं थी उससे कहीं ज्यादा उनको अपनी बीवी के द्वारा कही बातों की थी।
मां से तो पहले ही उसे कोई उम्मीद नहीं थी फिर भी उसने उनसे कितनी ही बार अपनी जिंदगी के लिए भीख मांगी। उनपे कोई असर नहीं हुआ पत्थर का दिल जो था मृगाक्षी के लिए आखिर थी तो मृगाक्षी की सौतेली मां न।
घर से निकलना बंद हो गया और चंचल सी हिरनी जैसी आंखों वाली लड़की अपने आंखों में सपनों की जगह आँसुओं का सैलाब लिए अपने ही घर में कैद हो के रह गई।
मृगाक्षी वर्ण से भले ही श्याम रंग की थी मगर आंखें उसके नाम के अनुरूप ही हिरनी सी चंचल और काली सुरमई सी थी। जो उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती थी। जो भी उन आंखो मे देखे तो उसमें डूबता ही चला जाए।
डांस करते वक्त उसके चेहरे पे आती लटे और उसपे कमर से नीचे लंबे काले लहराते बाल जिनको वो हमेशा ही खुला रखती थी बिल्कुल नागिन से लहराते थे।
डांस करते वक्त वो बिल्कुल अपनी मां की परछाई लगती थी जो खुद भी एक अच्छी कथक डांसर थी।
उसकी उम्र यही कोई २२ की रही होगी हां इस उम्र में अक्सर मन चंचल होता है। यही सोच उसके पिता ने एक ऊंचे घराने के मशहूर तबला वादक से उसका विवाह संपन्न कर दिए।
कबीर रोज सूर्यास्त के बाद घाट के सीढ़ियों पे बैठा उसका इंतजार करता रहा। मगर न मृगाक्षी आई न ही उसका कोई संदेश आया। संदेश आता भी तो कैसे उसने कभी किसी को अपने और कबीर के प्रेम के बारे में बताया ही नहीं था। यहां तक की एक दूसरे को भी नहीं रहन सके दोनो kanj
बस उनके प्रेम के साक्षी थे तो वो घाट की सीढ़ियां जिस पे दोनों हर शाम घंटों एक दूसरे के साथ बैठे बातें करते बिताया करते थे।
उस दिन उसके ऊपर पीली गुलाबी में रंगी बंधेज की सूट कितनी जंच रही थी। कमर तक खुले बाल, जिसमें सुनहरे रंग की झुमकी कभी छुपती तो कभी बालों की लटों के साथ अठखेलियां करती दिख रही थी।
दोनों भौंहों के बीच बिंदी की जगह उसके माथे का काला तिल उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दे रहा था मानो।
पैरों में पतली सी पाजेब और हाथों में हमेशा हरी चूड़ियां पहनी जब वो कबीर के कानों के पास खनकाती थी तो मानो उससे सुंदर मधुर ध्वनि कभी कबीर के कानों ने सुनी ही न हो और वो मंत्रमुग्ध भाव से उसके सौंदर्य को एक टक देखता ही रह गया था।
पहली बार कबीर घाट पे होने वाले वार्षिक कार्यक्रम में भाग लेने आया था। वैसे तो उसका परिवार किसी घराने से नही था मगर उसको तबला वादक बनने का बहुत शौक था। इसी शौक शौक में उसने तबला से उच्च शिक्षा ली और कई प्रतियोगिताओं में भाग ले उच्च प्रदर्शन किया।
उस दिन कबीर के तबले के ताल से ताल मिलाती मृगाक्षी ने घाट पे ही बेहद खूबसूरत नृत्य नाटिका प्रस्तुत की थी। वहां मौजूद लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था देखने को और सभी ने बहुत तारीफ की थी। तभी से कबीर और मृगाक्षी में दोस्ती हो गई और ये दोस्ती प्यार में कब बदल गई ये मृगाक्षी के इंतजार में बावरे हो चुके कबीर को तब समझ आया जब मृगाक्षी जा चुकी थी फिर कभी न आने के लिए।
कबीर उसके इंतजार में रोज शाम घाट के उसी सीढ़ी पे बैठ जाता जहां कभी वो मृगाक्षी के साथ बैठा करता था। अपने ख्यालों में खोया कबीर सीढ़ियों से उठ के जाने ही वाला था की तभी वही चूड़ियों की खनक की आवाज उसके कानों के पास से होते हुए गुजरी। लाल बनारसी साड़ी, कमर तक खुले काली नागिन से लहराते बाल, मेहँदी रची हाथों में लाल चूड़ियां, पैरों में मोटा सा छागल और आलता से रंगे पैर लिए एक लड़की बिल्कुल अप्सरा सी धीमे धीमे सीढ़ियों से उतर रही थी।
कबीर ने एक पल को हाथ बढ़ाया उसकी तरफ की उसको रोक के देख सके की क्या वो उसकी मृगाक्षी ही है?
या कोई और?
या कोई स्वप्न?
मगर वो ऐसा कर न सका वो वही जड़ हो गया मानो।
वो लड़की धीरे धीरे घाट पे नीचे तक उतरी और अपने पैरों को पानी में डालती हुई खड़ी हो गंगा को प्रणाम कर मंगलकामना करती दीपदान करने लगी। तभी कबीर का ध्यान उस लड़की के हाथ के नीचे हाथ को देख बगल खड़े उसके पति पे गया।
कबीर एक पल सिहर सा उठा ये सोच की ये उसकी मृगाक्षी नहीं हो सकती उसने उधर से नजरें फेर ली। मगर रह रह के चोर नजरों से वो एक नजर छुप के उस ओर देख ही लेता। वो जोड़ा जब पलटा तो कबीर की नजर उसके मांग में पड़े चौड़े लाल सिंदूर से होती हुई उसकी भौंहो के बीच लगी तिल की काली बिंदी पे पड़ी और उसका दिल वही धक कर गया उसके आगे उसे देखने की हिम्मत न हुई।
शायद सच का सामना करने की उसकी हिम्मत न हुई, या अपने प्यार को किसी और के साथ देखने की हिम्मत न हुई।
जब मृगाक्षी कबीर के बगल से गुजरी तो कबीर के कांधे पे उसके आंखों से बहते आंसू की एक बूंद पड़ी। जिससे कबीर विचलित हो उठा वो चाहता था मृगाक्षी को रोकना मगर बस जाती हुई मृगाक्षी को देखता रहा जब तक वो आंखों से ओझल ना हो गई। इस तरह आज महीनों का इंतजार कबीर का खत्म हुआ।
कबीर उठा और किनारे से एक दीपदान खरीदता हुआ सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा और उसने गंगा में अकेले ही मृगाक्षी के नए जीवन की मंगलकामना के साथ दीपदान कर वापस लौटने लगा अपने पहले प्यार के यादों के साथ... शायद यही प्यार है।
...समाप्त।
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