खिड़की... एक अधूरी मोहब्बत




यह कविता एक अधूरी मोहब्बत की उस खिड़की पर लिखी गई है,
जहाँ हर शाम उम्मीदें आकर ठहर जाती हैं।
कभी लौटने की आस, कभी यादों की हल्की दस्तक—
इन्हीं सबके बीच दिल हर दिन उसी खिड़की से
तेरे आने का ख़्वाब देखता है।

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