तेरी मेरी प्रेम कहानी













प्रेम!!! ढाई अक्षर का ये शब्द आखिर कितना खूबसूरत होता है न सुनने में, बोलने में, महसूस करने में, और साथ ही इसके होने के एहसास होने पे।

मगर क्या हम सही मायने में इसे समझ पाए?
क्या सच में इस ढाई अक्षर को पढ़ के हम पंडित कहला पाए?
आखिर क्या है ये प्रेम? जिसे होने में तो चंद मिनट भी नही लगते मगर समझने में सदियों गुजर जाते हैं।

किसी के लिए प्राकृतिक का सौन्दर्य प्रेम है, तो किसी के लिए बाल मन ही प्रेम है, किसी के लिए ईश भक्ति प्रेम है, तो किसी के लिए कला साधना ही प्रेम है, किसी के लिए किसी को पा लेना प्रेम है, तो किसी के लिए किसी का हो जाना ही प्रेम है, किसी के लिए कृष्ण की भक्ति में लीन मीरा, तो किसी के लिए राधा नाम ही प्रेम है, किसी के लिए वियोगी सीता और राम प्रेम है, तो किसी के लिए शिव में सती होना ही प्रेम है।

प्रेम एक ही है मगर उसके रूप अनेक है क्युकी ये एक शब्द मात्र ही नहीं अपितु भाव है जो प्रेमी के भाव से उपजता है और उसी में विलीन हो जाता है।

जब मैं छोटी थी, तब माँ के आँचल और पापा की गोद में छुपा था प्रेम। भाई बहनों के साथ मुझे लुका-छिपी खेलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती थी और प्रेम मुझे हमेशा ढूंढ लेता था। थोड़ी बड़ी हुई तो कुछ दोस्तों में मिल गया प्रेम। उस वक्त लगा था दोस्तों के साथ रूठना मनाना, लड़ना झगड़ना और फिर एक साथ खेलना खाना ही प्रेम है।

फिर जब थोड़ी और बड़ी हुई उस वक़्त मेरे लिए प्रेम का मतलब किसी अजनबी का मेरे दिल के दरवाजे पे दस्तक दे जाना ही प्रेम था, जो बाकी दोस्तों से अलग हो और ये एहसास ही मेरे यौवन के दहलीज पे कदम रखने के साथ पहले बसंत की निशानी थी।

जब लोग आंखो आंखो में देख मुस्कुराते थे, हाथों में गुलाब लिए गुनगुनाते थे, फिर शुरू हुआ एक सिलसिला प्रेम में जीने का , खोए खोए एहसास में मुस्कुराने का, जुदाई के गम में चुपके चुपके सारी रात आसू बहाने का, खिड़की से छिपके झांकते चांद से पहरो बात करने का और उसमे ही अपने प्रेमी का अक्श ढूंढने का, हवाओ के स्पर्श में प्रेम के स्पर्श के एहसास मात्र से रोमांचित होने का, फूलों की खुशबू में उनकी खुशबू महसूस करने का।

मगर कुछ सालों बाद जब दिल टूटा, तो लगा धत्त तेरे की प्रेम जैसी कोई चीज़ तो है ही नहीं? ये सारा संसार, वो प्रेम पे लिखे गीत, वो कविता , वो गजल , वो टूटता हुआ तारा, वो मुझ पर हंसता हुआ आधा चौदहवी का चांद, वो प्यार में डूबे परिंदे, वो हर बार की मुलाकात और उनकी हर एक बात सब झूठ है क्युकी प्रेम अपने आप में खुद एक झूठ है।

लेकिन सच कहूं मुझे क्या पता था? प्रेम के साथ मैं लुका-छुपी खेलूँ या नहीं, वह मुझ तक पहुंचने का अपना रास्ता बना ही लेगा।

और देखिए ना ! मुझे फिर प्रेम हुआ और तब मेरे लिए प्रेम हो गया किसी खास का ज़िन्दगी में होना। जो मुझे समझे और जरूरत पड़ने पे समझाए, मैं रोऊ तो मुझे अपने कांधे पे सिर रखने की जगह दे और जब सोऊ तब अपने सीने पे मेरा सिर रख धड़कते दिल के धड़कन की लोरी सुनाए। तब मुझे शायद पहली बार लगा प्रेम तो बस यही है, बाकी सब जो भी इसके पहले प्रेम के नाम पे जिया वो शायद सब झूठ था।

मगर कहते हैं ना प्रेम की उम्र बहुत छोटी है और दुख पहाड़ों सा। मेरा दिल एक बार फिर टूटा क्युकी सब कुछ था मेरे पास उसके दिए तोहफे , वादे, कसमें, खुशियां, साथ, आसू, छोटी मोटी तकरार, यहां तक कि वो प्रेमी भी। मगर फिर भी कुछ कमी सी थी और वो कमी ही मेरी आंखों को नमी का हर बार कारण बनती।

वो कमी थी किसी और की नहीं उसी प्रेम की जिस प्रेम को पाने की चाह में मैं सब कुछ छोड़ के उसके पीछे चली आई वो आज मुझ पे हंस रहे थे, मेरा मजाक उड़ा रहे थे, ऐसा लगता सब कुछ पा के भी मैंने कुछ खो दिया। ऐसा लगता प्रेम में मैंने एक बहुत बड़ी कीमत चुकता की हो और वो कीमत थी मेरे वजूद की, मेरे अस्तित्व की, मेरी खुद को पहचान की, जो मैंने प्रेम को पाने के होड़ में खो दिया।

मगर ये प्रेम भी न कितना ही ढीढ़ है ना वो मुझे छोड़ रहा न मैं उसे। मुझे एक बार फिर प्रेम हुआ, मगर इस बार खुद से। तब जाके मुझे ज़िन्दगी में पहली बार एहसास हुआ कि हम ताउम्र जिस प्रेम की तलाश में रहते हैं, उसको दूसरों में ढूंढते हैं, वह तो हमारे अंदर कहीं छुपा होता है और शायद इसलिए हमसे हर बार टकरा जाता है। हर बार प्रेम में धोखा खाने के बाद भी प्रेम हो जाता है।

अब मैं खुद से प्रेम करना धीरे धीरे सीख रही थी और यह भावना ही एक दम अलग थी। मुझे हर दिन लगने लगा कि अब मुझे समझ आने लगा कि प्रेम क्या होता है? खुद के लिए जीना ही तो है प्रेम।
अगर हम खुद से ही प्रेम नहीं किए तो किसी और से इस प्रेम की उम्मीद भला कैसे कर सकते हैं?
इसलिए मैंने खुद को प्रेम में थोड़ा थोड़ा संवारना शुरू किया, भागती जिंदगी में खुद के लिए दो घड़ी थम मुस्कुराना शुरू किया, घूमना शुरू किया और फूलों के साथ खिलना शुरू किया, चिड़ियों की चहचहाट और भौरो के गूंजो में, पहाड़ों के प्रेम में, बहती नदियों के वेग और संगम के सयोंग में, दूर बसे अनजान गाँवों की पगडंडियों से होती प्रेम की राह की आस में, विशाल किलों के जर्रे जर्रे में छुपी अमर प्रेम कहानियों, उगते सूरज की किरणों और ढलती शामों की लालिमा से मुझे धीरे धीरे फिर से प्रेम होने लगा और ज़िन्दगी में पहली दफ़ा एहसास हुआ कि सिर्फ जीवित चीजों से नहीं, निर्जीव चीजों से भी प्रेम किया जा सकता है और भरपूर किया जा सकता है। इसी के साथ मुझे एक बार फिर प्रेम हुआ मेरी डायरी और कलम से तब मुझे समझ आया प्रेम में हर बार पागल हुआ जा सकता है वो भी बिना किसी रुकावट और खेद के।

आह...कितना सुखद एहसास है प्रेम में होना, कितना सुंदर और रोमांचक भी। आगे आने वाले सालों में ना जाने और कितनी बार होगा प्रेम मुझे? यह मैं नहीं जानती। लेकिन मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि मुझे प्रेम को खोजने के लिए अब उससे और लुका-छिपी खेलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि मैं जानती हूँ प्रेम मुझे हरहाल में ढूंढ ही लेगा।
मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि जैसे ही मैं उसे समझने लगूँगी वो आ जाएगा किसी और रूप में मेरे सामने और गढ़ेगा मेरी कलम के स्याह रंग से फिर से कोई नयी प्रेम कहानियां , कविता, गजल, गीत और प्रेम की एक नई परिभाषा ... तेरी मेरी प्रेम कहानी की।


        ✍️अंजली श्रीवास्तव


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